नई दिल्ली (अभिषेक पराशर)। वर्ष 2025 में दुनिया के सामने मिस-इन्फॉर्मेशन और डिस-इन्फॉर्मेशन की चुनौतियां केवल बरकरार ही नहीं रहीं, बल्कि सिंथेटिक मीडिया (डीपफेक) ने इन्हें एक राजनीतिक-वित्तीय संकट के रूप में तब्दील कर दिया। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ‘ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट, 2025′ में मिस-इन्फॉर्मेशन को शॉर्ट टर्म (दो वर्ष) के लिए शीर्ष वैश्विक जोखिम के रूप में पहले पायदान पर रखा गया, वहीं दूसरी ओर भारत में इसका असर राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और आम नागरिकों की जेब पर साफ दिखा।
2025 में भारतीय और वैश्विक परिदृश्य में AI और डीपफेक तकनीक का उपयोग सूचना युद्ध के एक सशक्त हथियार के रूप में उभरा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और वैश्विक स्तर पर इजरायल-ईरान संघर्ष जैसी बड़ी भू-राजनीतिक घटनाओं से लेकर महाकुंभ जैसे आयोजन तक, हर जगह डीपफेक वीडियो और ऑडियो का इस्तेमाल प्रोपेगेंडा फैलाने का प्रमुख जरिया बना। इसके साथ ही, डीपफेक फ्रॉड देश की साइबर सुरक्षा के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती पेश कर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक अकेले भारत को इसकी वजह से 70,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि फेक या फॉल्स न्यूज से संबंधित मामलों में 2023 में 27% की बढ़ोतरी हुई। ऐसे में, यह विश्लेषण बताता है कि AI के नियमन के लिए वैश्विक शिखर सम्मेलनों (जैसे पेरिस AI एक्शन समिट) के बावजूद, फेक न्यूज और डीपफेक का बढ़ता दायरा कितनी बड़ी और जटिल चुनौती पेश कर रहा है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दखल!
2025 एक तरह से चुनावों का वर्ष रहा। भारत समेत दुनिया के कई अन्य देशों में चुनाव हुए। फरवरी में दिल्ली और नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए। इसके अलावा सितंबर में उप-राष्ट्रपति के चुनाव भी हुए। अन्य एशियाई देशों में सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, समेत अन्य शामिल रहें। वहीं कई यूरोपीय और अफ्रीकी देशों में भी चुनाव हुए। 2025 के चुनावों में मिस-इन्फॉर्मेशन और डिस-इन्फॉर्मेशन के तरीकों में तकनीक की वजह से बड़ा बदलाव देखने को मिला। पहले जहां केवल फेक न्यूज चुनौती हुआ करती थीं, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने इस पूरी स्थिति को और जटिल बना दिया है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025, AI-जनरेटेड डिस-इन्फॉर्मेशन (डीपफेक सहित) को वैश्विक चुनावों, विशेष रूप से लोकतांत्रिक देशों की चुनावी विश्वसनीयता और सामाजिक सद्भाव के लिए बड़ा खतरा बताती है। यूनेस्को (UNESCO) की रिपोर्ट भी चुनावों में एआई के इस्तेमाल के प्रभाव और दुष्प्रभावों के बारे में विस्तार से बताती है।
ब्रुकिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में जिन देशों में चुनाव हुए वह दुनिया की करीब 41 फीसदी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और कुल वैश्विक जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी 42 फीसदी है। “पिछले चुनावों की तरह, ऑनलाइन इकोसिस्टम ने इन कैंपेन की रूपरेखा तय करने में भूमिका निभाई, लेकिन नए डेवलपमेंट्स ने पहले से ही विवादित इन्फॉर्मेशन स्पेस पर दबाव बढ़ा दिया है और यह एक डेवलपमेंट है, जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी से बढ़ती तरक्की, जो किसी को भी यूजर के प्रॉम्प्ट या सवालों के आधार पर असली जैसी इमेज, वीडियो, ऑडियो या टेक्स्ट बनाने की सुविधा देती है।”
रिपोर्ट्स बताती है कि कैसे डीपफेक का इस्तेमाल मतदाताओं को भ्रमित करने, उम्मीदवारों के खिलाफ दुष्प्रचार करने और चुनावी नतीजों को अवैध या उन्हें अविश्वसनीय बताने में किया जाता है। नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट (एनडीआई) की रिपोर्ट भी चुनावी प्रक्रियाओं में एआई के जोखिमों और लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए सुझाव देती है।

चुनावों पर विश्वास न्यूज के फैक्ट चेक रिपोर्ट्स की एनालिसिस इन ट्रेंड्स की पुष्टि करता है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान BJP, JDU नेताओं की रैली के वीडियो को AI की मदद से मैनिपुलेट करते हुए, उसमें ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा जोड़ा गया। इसके अलावा ऐसे कई अन्य डीपफेक (मशहूर शख्सियतों के) वीडियो वायरल हुए, जिनका मकसद बिहार चुनाव के दौरान मतदाताओं को प्रभावित करना था।
2025 के चुनावों में एआई और डीपफेक के इस्तेमाल में तेजी देखी गई। वहीं भारत में विशेषकर बिहार चुनाव के संदर्भ में ‘वोट चोरी’ और चुनाव आयोग की प्रक्रिया एसआईआर को लेकर कई तरह की भ्रामक जानकारियां फैलाई गईं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार चुनावी मिस-इन्फॉर्मेशन न केवल चुनाव परिणामों को प्रभावित करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा भी कम करता है।
चुनावी मिस-इन्फॉर्मेशन के मामले में एआई क्रिएटेड कंटेंट के खतरों को तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं के जरिए समझा जा सकता है। पहला एआई बहुत कम खर्च में व्यापक मात्रा में फेक कंटेंट को बना सकता है। दूसरा, सामान्य नागरिकों के लिए वास्तविक और एआई क्रिएटेड कंटेंट के बीच फर्क करना मुश्किल है और तीसरा लगातार गलत सूचनाओं की वजह से आम जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी नतीजों पर भरोसा कम होने का खतरा पैदा हो जाता है।
मिस-इन्फॉर्मेशन नहीं बल्कि वित्तीय नुकसान भी!
डीपफेक कंटेंट की संख्या और इनसे होने वाले वित्तीय नुकसान, दोनों में भारी वृद्धि हुई है, जो न केवल फैक्ट चेकिंग के लिहाज से बड़ी चुनौती है, बल्कि इससे होने वाले वित्तीय नुकसान का दायरा कहीं अधिक व्यापक है। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एआई से होने वाला इम्परसोनेशन और देशों में फैला स्कैम नेटवर्क दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर उभरकर सामने आया है, जिससे 2024 में करीब 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ है।
साइबर सुरक्षा फर्म Keepnet Labs के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि 2023 में डीपफेक फाइलों की संख्या 5 लाख थी, जिनके 2025 में बढ़कर 8 मिलियन (80 लाख) होने का अनुमान है और यह मात्र दो वर्षों में 900% की विस्फोटक वृद्धि है। यही नहीं, डीपफेक आधारित फिशिंग और फ्रॉड की कोशिशों में 2023 में 3,000% का इजाफा हुआ। आज, कुल फ्रॉड के मामलों में डीपफेक की हिस्सेदारी 6.5% है, जो 2022 के मुकाबले 2,137% की भयावह वृद्धि है।

लेकिन यह खतरा यहीं तक सीमित नहीं है। Pi-Labs की ‘डिजिटल डिसेप्शन एपिडेमिक’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिए यह खतरा सीधे उसकी अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचा रहा है। वित्तीय फ्रॉड, आइडेंटिटी थेफ्ट और स्कैम के कारण 2025 में, अकेले भारत को 70,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है। वहीं, डेलॉए के अनुमान के मुताबिक, अमेरिका में जेनरेटिव AI फ्रॉड से 2027 तक 40 बिलियन डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।
भारत के संदर्भ में देखें तो डिजिटल ‘अरेस्ट’, इन्वेस्टमेंट स्कैम और फेक लोन एप्स ठगी के सबसे प्रचलित तरीके हैं। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके किए जाने वाले ‘डीपफेक’ और ‘फिशिंग’ हमलों ने इस खतरे को और अधिक जटिल बना दिया है। गृह मंत्रालय की तरफ से संसद को दी गई जानकारी के मुताबिक, 2024 में नागरिकों ने लगभग 22,845 करोड़ साइबर ठगी में गंवाए, जो 2023 की तुलना में करीब 200% से अधिक की वृद्धि है।

महाकुंभ, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’
2025 में भारतीय और वैश्विक परिदृश्य में AI और डीपफेक तकनीक का उपयोग सूचना युद्ध के एक सशक्त हथियार के रूप में उभरा। महाकुंभ, ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन मिडनाइट हैमर, ये तीन ऐसी प्रमुख घटनाएं रहीं, जहां एआई-जनरेटेड कंटेंट का इस्तेमाल व्यापक पैमाने पर हुआ।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ व्यापक पैमाने पर इन्फॉर्मेशन वॉर की स्थिति देखने को मिली, जिसमें पाकिस्तान स्थित सोशल मीडिया हैंडल्स से इस सैन्य अभियान को लेकर व्यवस्थित तरीके से दुष्प्रचार किया गया। यही वजह रही कि भारत सरकार ने बड़े पैमाने पर बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक करने का आदेश जारी किया।
इस दौरान भारत के गृह मंत्री और विदेश मंत्री एस जयशंकर के एआई क्रिएटेड वीडियो वायरल हुए, जिसमें उन्हें ऑपरेशन के दौरान भारत की ‘हार’ या उसे अधिक ‘नुकसान’ को स्वीकार करते हुए दिखाया गया। इस दौरान सैन्य अधिकारियों के चेहरे और आवाजों का इस्तेमाल करते हुए फेक एआई क्रिएटेड वीडियो बनाए गए, जिसका मकसद भारतीय सेना के खिलाफ दुष्प्रचार करना था। (यहां देखें: रिपोर्ट 1 और रिपोर्ट 2)

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर (पीओके) में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए सैन्य कार्रवाई की थी और यह मुख्य रूप से सात मई 2025 से 10 मई 2025 तक चला था, जिसके बाद पाकिस्तान ने संघर्ष विराम की गुहार लगाई थी और फिर 10 मई 2025 को संघर्ष विराम की घोषणा कर दी गई थी।
सोशल मीडिया पर इस सैन्य अभियान को लेकर मिस-इन्फॉर्मेशन का दौर चला, जिसमें भारत के खिलाफ पाकिस्तान की तरफ से सुनियोजित प्रोपेगेंडा का सहारा लिया गया और इसमें डीपफेक मल्टीमीडिया की प्रमुखता रही। गूगल ट्रेंड की 2025 की एनालिसिस यह बताती है कि मई महीने के बाद से लेकर अब तक यह विषय ट्रेंड कर रहा है और यही वजह है कि मई महीने के बाद दिसंबर तक इस अभियान के आस-पास मिस-इन्फॉर्मेशन फैलाए जाने के ट्रेंड्स जारी हैं।
नवंबर और दिसंबर महीने में इस अभियान को लेकर मुख्य रूप से थल सेना, नौसेना और वायुसेना प्रमुख के डीपफेक वीडियो को शेयर किया गया और इनके जरिए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिशें की गईं। इन वीडियो के जरिए इस सैन्य अभियान में पाकिस्तान की कथित बढ़त का दावा किया गया।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के दौरान केंद्र सरकार ने सहयोग पोर्टल के जरिए 19 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को करीब 2,300 ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी किए। इस अवधि में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जारी किए गए ऑर्डर भी शामिल हैं, जिनमें सरकार ने ऑनलाइन प्रोपेगेंडा का जवाब देने के लिए पाकिस्तान से चलने वाले हैंडल्स को ब्लॉक करने का आदेश जारी किया।
इतना ही नहीं, इस दौरान पाकिस्तान यूजर्स की तरफ से भारतीय प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और विदेश मंत्री के डीपफेक वीडियो को शेयर कर यह फेक दावा किया गया कि भारत ने इस संघर्ष में अपनी हार को स्वीकार कर लिया है। इस दौरान पाकिस्तान ने भारत के उर्दू भाषी यूजर्स को टारगेट करते हुए नफरत फैलाने, भ्रम पैदा करने और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने की कोशिश की। ऐसा करने के लिए जिस तरह के मल्टीमीडिया का सहारा लिया गया, उसकी एनालिसिस को यहां पढ़ा जा सकता है। साथ ही, पाकिस्तान को हुए नुकसान और भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान में हुए न्यूक्लियर रेडिएशन के कथित लीक के फेक दावे को भी शेयर किया गया।
इजरायल-ईरान संघर्ष में मिस-इन्फॉर्मेशन का माध्यम बना डीपफेक
ईरान और इजरायल के बीच चलने वाला प्रॉक्सी कॉन्फ्लिक्ट या अप्रत्यक्ष संघर्ष उस वक्त प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष में तब्दील हो गया, जब 13 जून 2025 को इजरायल ने ईरान पर हमला किया और इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की और फिर इस हमले में अमेरिका भी कूद पड़ा और उसने ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर‘ के जरिए ईरान के परमाणु संवर्धन केंद्रों को निशाना बनाया।
हालांकि, इस ऑपरेशन का सीधा संबंध भारत से नहीं था लेकिन सोशल मीडिया पर फैलाए गए डीपफेक के जरिए भारत को इसमें घसीटने की कोशिश की गई। ऑपरेशन के दौरान यह दावा किया गया कि भारत ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों (B2 बॉम्बर्स) को अपना हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति दी, जो पूरी तरह से फेक और निराधारा दावा था। केंद्र सरकार ने तत्काल इस दावे का खंडन करते हुए इसे फेक बताया। सोशल मीडिया पर इस संघर्ष से संबंधित मिस-इन्फॉर्मेशन इसी दौरान शेयर हुए, जिनमें एआई जेनरेटेड मल्टीमीडिया की प्रमुखता रही। इसके अलावा अन्य अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में बांग्लादेश सियासी संकट में भी डीपफेक मल्टीमीडिया का इस्तेमाल किया गया।
महाकुंभ
2025 में महाकुंभ का आयोजन हुआ और उपलब्ध फैक्ट चेक रिपोर्ट्स के आधार पर देखें तो इसे लेकर तीन तरह के मिस-इन्फॉर्मेशन सामने आए। इनमें पहली श्रेणी सेलिब्रिटी डीपफेक की रही, जिसमें मशहूर हस्तियों की एआई क्रिएटेड तस्वीरों को शेयर करते हुए उनके संगम में स्नान करने का दावा किया गया।
दूसरी श्रेणी सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील कंटेंट (जिसमें साधु के वेश में आतंकी का पकड़ा जाना समेत अन्य) और महाकुंभ में मची भगदड़ से संबंधित दावे रहे, जिनमें अलग देशों और अन्य आयोजनों की तस्वीरों और वीडियो को शेयर कर फेक दावा किया गया।

वहीं, तीसरी श्रेणी में महाकुंभ की तैयारियों और इसके समापन से संबंधित आयोजनों के नामों पर गलत और असंबंधित मल्टीमीडिया का इस्तेमाल शामिल रहे, जिनमें इन आयोजनों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। जैसे, महाकुंभ के आखिरी दिन एयर फोर्स के ‘त्रिशूल फॉर्मेशन’ को बनाए जाने का दावा, या फिर समापन के दौरान हुई ‘भव्य’ आतिशबाजी का दावा शामिल था।
2025 में कैसा रहा डीपफेक ट्रेंड्स?
पिछले वर्ष की तरह ही 2025 में भी डीपफेक का दायरा केवल राजनीतिक क्षेत्र और राजनीतिक दुष्प्रचार के मामलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मनोरंजन जगत भी इसके दायरे में शामिल रहे। एआई से संबंधित मुख्य तीन तरह के ट्रेंड्स नजर आए, जिनमें राजनीतिक दुष्प्रचार के लिए डीपफेक ऑडियो और वीडियो का इस्तेमाल के साथ फाइनेंशियल मिस-इन्फॉर्मेशन (साइबर फ्रॉड समेत) और हेल्थ मिस-इन्फॉर्मेशन शामिल हैं।
2025 चुनावों का वर्ष रहा। फरवरी में दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ और फिर साल के अंत में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ। इसके अलावा उपराष्ट्रपति के चुनाव के साथ कई राज्यों में खाली हुई विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी हुए। हालांकि, चुनावी मिस-इन्फॉर्मेशन मुख्य रूप से दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावाें के दौरान ही देखने को मिला, जिसमें डीपफेक मल्टीमीडिया की भी प्रमुखता रही।
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी, जेडीयू नेताओं की रैली के वीडियो को एआई की मदद से मैनिपुलेट करते हुए उसमें ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा जोड़ा गया। इसके अलावा ईवीएम मैनिपुलेशन और चुनाव के नतीजों में छेड़छाड़ का मुद्दा भी मिस-इन्फॉर्मेशन के केंद्र में रहा।

चुनावों के दौरान राजनीतिक दुष्प्रचार के लिए डीपफेक ऑडियो या वीडियो का इस्तेमाल हुआ। हालांकि, इनकी संख्या बहुत अधिक नहीं रही। वहीं, फाइनैंशियल मिस-इन्फॉर्मेशन की श्रेणी में मुख्य तौर पर असाधारण रिटर्न के आश्वासन के साथ, बड़े कॉरपोरेट लीडर्स की आवाज वाले सिंथेटिक ऑडियो का इस्तेमाल किया गया।
वहीं, स्वास्थ्य संबंधी भ्रामक और गलत सूचनाओं की वजह से न केवल लोगों की सेहत प्रभावित होती है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी व्यापक नुकसान होता है। भारत में एआई के जरिए डॉक्टर्स के चेहरे और आवाज का इस्तेमाल कर (डॉ. नरेश त्रेहन या डॉ. देवी शेट्टी के डीपफेक) कर गलत दवाओं के प्रभाव को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाता है। साइबर सुरक्षा कंपनियों के मुताबिक ऐसे ‘मिरेकल क्योर’ (‘चमत्कारिक इलाज’) विज्ञापन की वजह से लोगों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।
फेक/फॉल्स न्यूज पर क्या कहते हैं आंकड़े?
दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी फेक न्यूज से निपटने के लिए किसी विशेष कानून या नियमन की मौजूदगी नहीं है, लेकिन फेक न्यूज और मिस-इन्फॉर्मेशन से संबंधित मामलों में कानूनी कार्रवाई के लिए आईपीसी (अब भारतीय न्याय संहिता/BNS) और आईटी एक्ट की कई सुसंगत धाराओं का इस्तेमाल किया जाता है।
बीएनएस (पू्र्व में आईपीसी) की धाराओं के साथ आईटी एक्ट, 2000 की धाराओं 67, 69 और 79 और आपदा प्रबंधन एक्ट, 2005 की धारा 54 और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 में ऐसे कई प्रावधानों को सुनिश्चित किया गया है, जिनके तहत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर व्यक्तियों के डेटा के दुरुपयोग के मामलों में कार्रवाई की जा सकती है। बताते चलें कि भारत में डीपीडीपी एक्ट को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) फाल्स/फेक न्यूज/अफवाह फैलाए जाने से संबंधित मामलों को आईपीसी की धारा 505 के तहत दर्ज करता है। एनसीआरबी की 2023 की वार्षिक रिपोर्ट ‘क्राइम इन इंडिया’ के मुताबिक,2023 में फॉल्स या फेक न्यूज के कुल 1,087 मामले दर्ज किए गए, जो 2022 के मुकाबले करीब 27 फीसदी अधिक हैं।

एनसीआरबी की 2022 की वार्षिक रिपोर्ट ‘क्राइम इन इंडिया’ के मुताबिक, 2022 में फेक न्यूज फैलाए जाने के खिलाफ कुल 858 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले दो वर्षों के मुकाबले तुलनात्मक रूप से कम हैं। 2020 में ऐसे कुल 1527 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2021 में ऐसे कुल 882 मामले दर्ज किए गए थे। 2022 के मुकाबले 2023 में भारत में फॉल्स या फेक न्यूज के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।
AI सम्मेलनों का दौर और डीपफेक के खतरे की गंभीरता पर सहमति
2025 हालांकि, पिछले कई वर्षों के मुकाबले विशेष रहा क्योंकि इस वर्ष कई महत्वपूर्ण वैश्विक और तकनीकी सम्मेलन हुए, जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के नियमन, सुरक्षा और विकास का मुद्दा प्रमुख रहा। फरवरी महीने में फ्रांस के पेरिस में एआई एक्शन समिट हुआ, जिसमें सुरक्षित, भरोसेमंद और समावेशी एआई के लिए वैश्विक मानकों को स्थापित किए जाने के मुद्दों पर चर्चा की गई। फ्रांस और भारत ने इस सम्मेलन की सह-अध्यक्षता की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए।
पीएम मोदी ने इस सम्मेलन के लिए पेरिस पहुंचने से पहले, एक वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में राष्ट्रपति मैक्रों ने साथ मिलकर ‘तकनीकी संप्रभुता’ की दिशा में काम करने की जरूरत पर बल देते हुए कहा, “भारत और फ्रांस अग्रणी हैं, लेकिन अमेरिका और चीन हमसे बहुत आगे हैं। हम एआई पर एक साथ काम करना चाहते हैं। हम भी नई टेक्नोलॉजी का फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि यह भारत में भी हो।”
अक्टूबर 2025 में स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में एआई पॉलिसी सम्मेलन हुआ, जिसमें एआई का नियमन और पब्लिक पॉलिसी का मुद्दा छाया रहा। इसके अलावा, भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में ऐसे कई सम्मेलन हुए और इन सभी सम्मेलनों में डीपफेक का मुद्दा प्रमुखता से उठा और इस बात को लेकर सहमति बनती दिखी कि डीपफेक, विशेष रूप से लोकतांत्रिक देशों में चुनावों की विश्वसनीयता और सामाजिक सद्भाव के लिए एक ‘गंभीर जोखिम’ है, जैसा कि विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट से भी स्पष्ट है, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है।

नवंबर 2023 में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी डीपफेक की चुनौती के बारे में बात करते हुए इसे समाज और लोकतंत्र, दोनों के लिए बड़ा खतरा बताया और टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स को डीपफेक कंटेंट की पहचान करने और उन्हें तेजी से हटाने के लिए मैकेनिज्म को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक आह्वान के बाद, भारत सरकार ने डीपफेक और भ्रामक सामग्री से निपटने के लिए मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थाओं के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021) में महत्वपूर्ण और कठोर बदलाव किए हैं। इन बदलावों में इंटरमीडियरीज की जवाबदेही को तय करने पर विशेष रूप से बल दिया गया है। इसमें 36 घंटे के भीतर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को डीपफेक या आपत्तिजनक सामग्री की शिकायत मिलने के बाद उसे हटाया जाना शामिल है।
2026 में क्या होगा?
2025 के अनुभवों और अनुमानों के आधार पर देखा जाए तो 2025 एआई के नियमन के लिहाज से निर्णायक वर्ष होने वाला है। 2026 में जहां डीपफेक थ्रेट में वृद्धि होगी, वहीं इससे निपटने की दिशा में संगठित प्रयासों के तहत डिटेक्शन इकॉनमी का भी विस्तार होगा। इसके साथ ही AI नियमन को लेकर सख्ती और वैश्विक सहमति के प्रयासों में भी तेजी का अनुमान है। साथ ही पहले से बने कानून पूरी तरह से लागू होंगे और नए नियमों का ढांचा तैयार होने की उम्मीद है।

2025 का वर्ष यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मिस-इन्फॉर्मेशन और डिस-इन्फॉर्मेशन केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक और लोकतांत्रिक खतरा बन चुका है। वायरल दावों, उपलब्ध न्यूज और फैक्ट चेक रिपोर्ट्स की एनालिसिस के आधार पर भारत के संदर्भ में, यह खतरा तीन मोर्चों पर नजर आ रहा है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति जैसे संवेदनशील सैन्य अभियानों में भी डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए किया गया, जो यह दिखाता है कि सिंथेटिक मीडिया अब हाइब्रिड वॉरफेयर का एक अभिन्न अंग बन चुका है।
बिहार समेत अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दुष्प्रचार के लिए डीपफेक और मैनिपुलेटेड मीडिया का उपयोग हुआ, जो चुनावी विश्वसनीयता को लेकर मतदाताओं के मन में संदेह पैदा करता है और तीसरा मोर्चा, इसकी वजह से होने वाला वित्तीय नुकसान है, जिसे आर्थिक ‘सुनामी’ कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों का विश्लेषण करती अन्य ईयर एंडर को यहां और यहां पढ़ा जा सकता है।
The post Vishvas News Analysis: 2025 में मिस-इन्फॉर्मेशन और गंभीर वित्तीय नुकसान का जरिया बना #Deepfake appeared first on Vishvas News.
0 Comments