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Explainer: जानें बैंक में आपकी जमा पूंजी को कैसे सुरक्षित रखता है डिपॉजिट इंश्योरेंस

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अनियमितताओं का हवाला देते हुए मुंबई के न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक पर कई प्रतिबंध लगाए जाने की घोषणा की। आरबीआई ने 13 फरवरी से न्यू इंडिया को-ऑप बैंक को बिना उसकी अनुमति के ऋण जारी करने, निवेश करने या नई जमा स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगाते हुए बैंक को निर्देश दिया कि वह किसी जमाकर्ता के बचत या चालू खाते या किसी अन्य खाते से कोई राशि निकालने की अनुमति न दे।

2019 में सामने आए पीएमसी संकट (पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक संकट) के दौरान भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी, जब आरबीआई ने कार्रवाई करते हुए बैंक की गतिविधियों को छह महीने के लिए प्रतिबंधित करते हुए ग्राहकों की जमा निकासी की लिमिट को सीमित कर दिया था। बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का मुकदमा दर्ज करते हुए इसकी जांच शुरू की।

2019 में सामने आए पीएमसी संकट ने बैंक के डूबने की स्थिति में जमा राशि की सुरक्षा को लेकर लोगों को आशंकित किया और इसे देखते हुए सरकार ने 2020 में बैंक जमा पर मिलने वाले बीमा कवर को बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दिया, जिसे अब एक बार फिर से बढ़ाए जाने की तैयारी है।

डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्रेटरी एम नागराजू ने कहा कि केंद्र सरकार डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीआईसीजीसी) बीमा कवर को पांच लाख रुपये से अधिक करने के बारे में सोच रही है। अगर सरकार बैंक जमा पर मिलने वाले बीमा कवर को बढ़ाने का फैसला लेती है तो बैंक के डूबने की स्थिति में बैंक के ग्राहकों को उनकी जमा रकम पर बेहतर सुरक्षा मिलेगी। यानी बैंक के डूबने या दीवालिया होने की स्थिति में जमाकर्ताओं की जमा बीमा या डिपॉजिट इंश्योरेंस का दायरा मौजूद पांच लाख रुपये से अधिक हो जाएगा।

अलग-अलग न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार इस बीमा कवर को मौजूदा पांच लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये तक करने के बारे में सोच रही है। डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC), भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तहत काम करने वाली कंपनी है, जो बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के दीवालिया होने की स्थिति में जमाधारकों की बैंक में जमा पूंजी को बीमा कवर मुहैया कराती है।

डीआईसीजीसी के दायरे में बचत खाता, फिक्स्ड डिपॉजिट, चालू खाता और रेकरिंग डिपॉजिट आते हैं और फिलहाल यह प्रति जमाधारक पांच लाख रुपये तक का बीमा कवर देता है।

डिपॉजिट इंश्योरेंस के लिए बैंक भरते हैं प्रीमियम

यह संस्था बैंकों के ग्राहकों को उनकी जमा पूंजी पर बीमा कवर देता है और इस बीमा कवर के लिए बैंक डीआईसीजीसी को प्रीमियम का भुगतान करते हैं। सामान्य और आसान शब्दों में समझें तो जैसे हम अपनी सुरक्षा के लिए जीवन बीमा लेते हैं और उसके लिए हमें प्रीमियम का भुगतान करना होता है, वैसे ही बैंक ग्राहकों के जमा रकम पर बीमा कवरेज देने के लिए डीआईसीजीसी को प्रीमियम का भुगतान करते हैं और बदले में डीआईसीजीसी बैंक के ग्राहकों को उनकी जमा पर बीमा की सुविधा देती है।

इसके दायरे में सभी कमर्शियल यानी व्यावसायिक बैंक आते हैं, जिसमें भारत में काम करने वाली विदेशी बैंकों की शाखाएं भी शामिल हैं। साथ ही यह क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों समेत अन्य को भी कवर देता है।

डीआईसीजीसी की 2023-24 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2024 के अंत तक पंजीकृत इंश्योर्ड बैंकों की संख्या 1997 थी और डीआईसीजीसी को इस वर्ष कुल 23,879 करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला। इसमें करीब 94 फीसदी योगदान के साथ कमर्शियल बैंकों की हिस्सेदारी सर्वाधिक रही। वहीं छह फीसदी योगदान सहकारी बैंकों का रहा।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2024 के अंत तक जहां बीमा के दायरे में आने वाले जमा खातों का प्रतिशत 97.8% है, वहीं कुल सुरक्षित जमा रकम यानी बीमा कवर में आने वाली जमा पूंजी का प्रतिशत (इंश्योर्ड डिपॉजिट रेशियो) 43.1% है।

आंकड़ों में देखें तो 31 मार्च 2024 तक इंश्योर्ड बैंकों में कुल डिपॉजिट यानी जमा रकम 2,18,23,481 करोड़ रुपये थी, जिसमें से 43.1% इस बीमा कवर के दायरे में हैं, जबकि 56.9% इस दायरे से बाहर यानी असुरक्षित हैं।

खाता संख्या के लिहाज से बात करें तो 289.8 करोड़ कुल खातों में 2.2% आंशिक रूप से सुरक्षित हैं, जबकि 97.8 फीसदी खाते इसके तहत पूरी तरह से सुरक्षित हैं।

DICGC की शुरुआत और विकास

डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीआईसीजीसी) का संचालन डीआईसीजीसी एक्ट, 1961 और डीआईसीजीसी जनरल रेग्युलेशंस, 1961 के तहत होता है। 1948 में बंगाल के बैंकिंग संकट के बाद बैंकों में जमा रकम को बीमा के दायरे में लाने का विचार सामने आया। इसके बाद 1940 में ग्रामीण बैंकिंग जांच समिति ने इस विचार का समर्थन किया और बाद में 1960 में पलाई सेंट्रल बैंक लिमिटेड और लक्ष्मी बैंक लिमिटेड के फेल होने के बाद रिजर्व बैंक और भारत सरकार ने इस जमा बीमा को लेकर गंभीर रुख दिखाया।

और फिर 1 जनवरी 1962 को डिपॉजिट इंश्योरेंस एक्ट 1961 अस्तित्व में आया। शुरुआत में डिपॉजिट इंश्योरेंस स्कीम केवल कमर्शियल बैंकों तक सीमित थी, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और उसके सहायक बैंक, अन्य कमर्शियल बैंक और भारत में काम करने वाले विदेशी बैंक की शाखाएं शामिल थीं। डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (संशोधन) अधिनियम, 1968 के लागू होने के बाद सहकारी बैंक भी डिपॉजिट इंश्योरेंस के दायरे में आ गए।

इसके बाद भारत सरकार ने आरबीआई के साथ सलाह-मशविरा कर जुलाई 1960 में क्रेडिट गारंटी स्कीम की शुरुआत की और रिजर्व बैंक को इस योजना के प्रशासन का जिम्मा सौंपा गया और बैंकों और अन्य ऋण संस्थानों द्वारा लघु उद्योगों को दिए गए कर्ज की गारंटी देने के लिए इसे क्रेडिट गारंटी संगठन के रूप में नामित किया गया।

रिजर्व बैंक ने 31 मार्च 1981 तक इस स्कीम का संचालन किया। हालांकि, इसी बीच आरबीआई ने 14 जनवरी 1971 को पब्लिक लिमिटेड कंपनी के तौर पर क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (CGCI) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य कमर्शियल बैंकों को को गैर-औद्योगिक गतिविधियों में लगे समाज के कमजोर वर्गों की कर्ज जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करना था। यह आरबीआई के परिभाषित प्राथमिकता क्षेत्र के तहत कवर किए गए छोटे और जरूरतमंद कर्जदारों को ऋण संस्थानों द्वारा दिए गए कर्ज को गारंटी कवर देते हुए किया जाता था।

डिपॉजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी का एकीकरण

डिपॉजिट इंश्योरेंस या जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी के काम को देखने वाले दोनों अलग-अलग संस्थाओं डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (डीआईसी) और सीजीसीआई का विलय करते नई संस्था डीआईसीजीसी का निर्माण किया गया, जो 15 जुलाई 1978 को अस्तित्व में आया और इसके बाद डिपॉजिट इंश्योरेंस एक्ट, 1961 को संशोधित कर उसका नाम ‘डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन एक्ट, 1961’ कर दिया गया।

अब यही संस्था बैंकों में जमा रकम के लिए डिपॉजिट इंश्योरेंस स्कीम का संचालन करती है।

डिपॉजिट इंश्योरेंस का बढ़ता कवरेज

शुरुआत में डिपॉजिट इंश्योरेंस का दायरा केवल 1,500 रुपये थे, जिसे 1 जनवरी 1968 में बढ़ाकर 5,000 रुपये और फिर 1970, 1976, 198, 1993 में इसे बढ़ाकर क्रमश: 10,000, 20,000, 30,000 और एक लाख रुपये किया गया।

2019 में पीएमसी संकट के बाद सरकार ने इसमें पांच गुना इजाफा करते हुए इसे 1 मई 1993 के एक लाख रुपये से बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दिया गया, जिसे एक बार फिर से बढ़ाए जाने की तैयारी हो रही है।

बताते चलें कि (i) विदेशी सरकारों की जमा पूंजी, (ii) केंद्र/राज्य सरकारों की जमा रकम, (iii) इंटर-बैंक डिपॉजिट, (iv) भारत के बाहर प्राप्त डिपॉजिट,और (v) भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्व स्वीकृति से निगम द्वारा विशेष रूप से छूट प्राप्त डिपॉजिट के अलावा डीआईसीजीसी सभी बैंकों के डिपॉजिट का बीमा करता है।

बैंक डूब जाए तो क्या होगा?

अगर कोई बैंक दीवालिया हो जाता है, तो उसके खाताधारकों को तीन महीने की अवधि के भीतर बीमा कवर में आने वाली रकम यानी 5 लाख रुपये तक की राशि उसे दे दी जाती है और यह भुगतान डीआईसीजीसी की तरफ से किया जाता है।

भुगतान की अधिकतम राशि 5 लाख रुपये होती है, जिसमें मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होता है। बताते चलें कि डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गांरटी कॉरपोरेशन (संशोधन अधिनियम) 2021 की वजह से बीमा वाली रकम का भुगतान अब तीन महीनों के भीतर कर दिया जाता है, जबकि पहले ऐसा होने में कई साल लग जाते थे।

इंश्योर्ड डिपॉजिट अनुपात

जैसे किसी भी देशा में बीमा की स्थिति को मापने के लिए दो मानकों इंश्योरेंस पेनिट्रेशन और इंश्योरेंस डेंसिटी जैसे दो मानकों का इस्तेमाल किया जाता है।

देखें एक्सप्लेनर और वीडियो:

वैसे ही जमा बीमा के मामले में इंश्योर्ड डिपॉजिट अनुपात जैसे मानक का इस्तेमाल होता है, और यह न्यूनतम 21.5 फीसदी से अधिकतम 71 फीसदी के बीच मौजूद है। 21.5 फीसदी इंश्योर्ड डिपॉजिट रेशियो के साथ तुर्की सबसे निचले पायदान पर मौजूद है, वहीं 71 फीसदी जमा बीमा अनुपात के साथ बेल्जियम सबसे शीर्ष पर मौजूद है।

वहीं, भारत 46.3% अनुपात के साथ शीर्ष 10 देशों की रैकिंग में 8वें पायदान पर आता है, जबकि एशिया प्रशांत क्षेत्र में वह तीसरे पायदान पर मौजूद है। अगर डिपॉजिट इंश्योरेंस फंड साइज के आधार पर देखें तो भारत अमेरिका और जापान के बाद तीसरे स्थान पर मौजूद है।

डीआईसीजीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में वैश्विक स्तर पर जमा बीमा का अनुपात करीब 41 फीसदी रहा, वहीं 59 फीसदी जमा रकम बीमा के दायरे से बाहर रहीं।

भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो आकलन किए गए कुल जमा के मुकाबले अन-इंश्योर्ड रेशियो (यूएआईडीआर) 31 मार्च 2024 तक 80 फीसदी के नीचे रहा है। यह ’80/20′ फॉर्मूला के मुताबिक, जो यह बताता है कि इंश्योर्ड डिपॉजिट रेशियो हमेशा 20 फीसदी के ऊपर रहना चाहिए या यूआईडीआर 80 फीसदी से कम रहना चाहिए। 1969 से 2009 की अवधि में भारत का यूआईडीआर 50 फीसदी से नीचे रहा है। हालांकि, वैश्विक अनुपात के मुकाबले 31 मार्च 2024 तक यह अनुपात 56.9 फीसदी रहा।

बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य मामलों की विस्तृत जानकारी प्रदान करती एक्सप्लेनर रिपोर्ट को विश्वास न्यूज के एक्सप्लेनर सेक्शन में पढ़ा जा सकता है।

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