नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक की डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं पर दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस बीच पीएम मोदी की शिक्षा से जोड़कर सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है। इस पर ‘दिल्ली यूनिवर्सिटी’ (डीयू) और ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी’ लिखा है। कुछ यूजर्स इसे शेयर कर दावा कर रहे हैं कि यह पीएम मोदी का दिल्ली यूनिवर्सिटी का स्नातक शिक्षा से जुड़ा आई कार्ड है।
विश्वास न्यूज की जांच में वायरल तस्वीर एआई-निर्मित निकली। दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्थापना 1922 में हुई थी, जबकि फेक आई कार्ड पर यह 1958 दिया गया है।
क्या है वायरल पोस्ट?
विश्वास न्यूज के वॉट्सऐप नंबर 9205270923 पर भी एक यूजर ने इस तस्वीर को भेजकर इसकी सच्चाई बताने का आग्रह किया।

पड़ताल
वायरल फोटो पर ‘ऑथराइज्ड सिग्नेटरी’ में ‘नरेंद्र मोदी’ नाम से हस्ताक्षर दिख रहा है, जबकि इस पर यूनिवर्सिटी के किसी अधिकारी का साइन होना चाहिए था। इससे हमें यह तस्वीर संदिग्ध लगी। इसके बाद हमने इस आई कार्ड में दी गई जानकारी के अनुसार जांच शुरू की।

दिल्ली यूनिवर्सिटी का स्थापना वर्ष
आईडी कार्ड पर दिल्ली यूनिवर्सिटी का स्थापना वर्ष 1958 दिया गया है। इस बारे में हमने डीयू की आधिकारिक वेबसाइट को स्कैन किया। इसमें दी गई जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय की स्थापना 1922 में हुई थी।

स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग
आई कार्ड पर शैक्षणिक वर्ष 1978-79 लिखा है और इस पर ‘स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग’ (SOL) दिया गया है। डीयू की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, 1962 में एसओएल को एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया था। तब इसे ‘डायरेक्टरेट ऑफ कॉरेस्पोंडेंस कोर्सेज’ के नाम से जाना जाता था। 1968 में इसका नाम बदलकर ‘स्कूल ऑफ कॉरेस्पोंडेंस कोर्सेज एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन’ (SOCCCE) कर दिया गया। 2004 में इसका नाम बदलकर COL/SOL कर दिया गया। मतलब, 1978-79 में इसका नाम ‘स्कूल ऑफ कॉरेस्पोंडेंस कोर्सेज एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन’ था, ‘स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग’ नहीं।

बारकोड की शुरुआत
भारत में बारकोड के इस्तेमाल की बात करें, तो एक नॉन-प्रॉफिट ग्लोबल संस्था ‘GS1’ पूरे देश में बारकोड को मैनेज करती है। यह संस्था ऐसे बारकोड जारी करने का काम संभालती है, जिन्हें दुनिया में कहीं भी स्कैन किया जा सकता है। GS1 इंडिया की स्थापना 1996 में भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय और प्रमुख चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने मिलकर एक गैर-लाभकारी संगठन के तौर पर की थी। मतलब, भारत में आधिकारिक तौर पर बारकोड की शुरुआत 1996 में हुई, जबकि 1978-79 के वायरल आई कार्ड पर बारकोड दिया गया है। इससे हमें यह तस्वीर और संदिग्ध लगी।

अभी तक की पड़ताल से यह तो साफ हो गया कि वायरल आई कार्ड में दी गई जानकारियां गलत हैं, जिससे हमें इसके एआई से बने होने का संदेह हुआ। हमने तस्वीर को एआई डिटेक्शन टूल्स से चेक किया। ‘हाइव मॉडरेशन’ से चेक करने पर इसे करीब 70 फीसदी एआई संभावित बताया गया।

‘साइट इंजन’ ने 99 प्रतिशत और ‘वाज इट एआई’ ने तस्वीर के 91 प्रतिशत एआई से बने होने की संभावना जताई।


इस बारे में हमने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. विजय सोनकर शास्त्री से संपर्क कर उन्हे वायरल तस्वीर भेजी। उन्होंने इसे फेक बताया।
क्या है संदर्भ?
मई 2016 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने पीएम मोदी की बीए की डिग्री दिखाई थी। ‘आजतक’ की 10 मई 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, “इसके अगले दिन डीयू ने डिग्री को असली बताते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय के पास पीएम के स्नातक से जुड़े सभी रिकॉर्ड हैं। उन्होंने 1978 में परीक्षा पास की और 1979 में उनको डिग्री दी गई थी।”

‘एएनआई’ की वेबसाइट पर 20 अगस्त 2026 को छपी रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट ने पीएम मोदी की स्नातक डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील पर सुनवाई के लिए 29 सितंबर 2026 की तारीख दी है। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच उन याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जिनमें सिंगल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें पीएम मोदी के शैक्षणिक रिकॉर्ड बताने के सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) के निर्देश को रद कर दिया गया था। बता दें कि यह मामला 25 अगस्त 2025 को दिए गए सिंगल-जज के फैसले से जुड़ा है, जिसमें पीएम मोदी की बैचलर डिग्री से जुड़े रिकॉर्ड बताने के CIC के आदेश को रद कर दिया था।

निष्कर्ष: पीएम मोदी के दिल्ली यूनिवर्सिटी के आईडी कार्ड के दावे से एआई-निर्मित तस्वीर वायरल हो रही है। वायरल फोटो में कई जानकारियां गलत दी गई हैं।
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