नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। देश के राष्ट्रीय स्मारक इंडिया गेट को लेकर समय-समय पर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल होती रहती है, जिसमें दावा किया जाता है कि इस स्मारक पर 95,300 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम लिखे हैं। इनमें से 61395 मुस्लिम और 8050 सिख हैं। इनके अलावा 14480 पिछड़े, 10777 दलित, 598 सवर्ण और संघी जीरो हैं। आइए, इस रिपोर्ट में इन सवालों के जवाब जानते हैं।

इतिहास
डीएम नई दिल्ली की वेबसाइट के अनुसार, इसकी आधारशिला ड्यूक ऑफ कनॉट ने साल 1921 में रखी थी। एडविन लुटियन ने इसको डिजाइन किया था। करीब 10 साल बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने इसे देश को समर्पित कर दिया। यह 42 मीटर ऊंचा है और एक चौराहे के बीच में आर्कवे की तरह ‘आर्क-डी-ट्रायम्फ’ है।

इंडिया गेट की तस्वीर देखने पर पता चलता है कि इस पर भारत और उसके दोनों तरफ MCMXIV (1914 बाएं) व MCMXIX (1919 दाएं) लिखा हुआ है। इसके अलावा इस पर लिखा है,
To the dead of the Indian armies who fell and are honoured in France and Flanders Mesopotamia and Persia East Africa Gallipoli and elsewhere in the near and the far-east and in sacred memory also of those whose names are recorded and who fell in India or the north-west frontier and during the Third Afghan War.
(भारतीय सेना के शहीदों के लिए, जो फ्रांस और फ्लैंडर्स मेसोपोटामिया और पर्सिया पूर्वी अफ्रीका गैलीपोली और अन्य जगहों पर शहीद हुए और उनकी पवित्र स्मृति में भी, जिनके नाम दर्ज हैं, जो भारत में या उत्तर-पश्चिमी सीमा और तीसरे अफगान युद्ध में शहीद हुए।)

इनके नाम लिखे हैं
यह स्मारक उन 70 हजार सैनिकों की याद दिलाता है, जो प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए थे। इस स्मारक पर 13516 से ज्यादा ब्रिटिश और भारतीय जवानों के नाम हैं, जिन्होंने पश्चिमोत्तर सीमांत अफगान युद्ध 1919 में जान गंवाई थी।
कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव कमीशन की वेबसाइट पर भी इंडिया गेट के बारे में जानकारी दी गई है। इसके मुताबिक, स्मारक पर दिए गए करीब 13300 सैनिकों के नाम से एक हजार से ज्यादा जवानों के शव सिंधु नदी के पश्चिम में स्थित कब्रिस्तानों में दफन हैं। बाकी सैनिक उत्तर पश्चिमी सीमा पर या उससे आगे और तीसरे अफगान युद्ध के दौरान लड़ते हुए मारे गए और उनकी कोई कब्र नहीं है। यह स्मारक भारत के उन 70 हजार सैनिकों की याद में भी है, जो 1914-1921 के दौरान शहीद हुए थे। इसका उद्घाटन लॉर्ड इरविन ने 12 फरवरी 1931 को किया था।
इसमें 13220 शहीदों के नाम भी दिए गए हैं। इनमें यूनाइटेड किंगडम और ऑस्ट्रेलिया के सैनिकों के नाम भी शामिल हैं। इनमें करीब 12260 भारतीय हैं। सेक्शन में नाम, रैंक, सर्विस नंबर, यूनिट, रेजीमेंट, कंट्री ऑफ सर्विस, शहीद होने की तारीख और जिस जगह पर नाम अंकित है, वहां की जानकारी दी गई है। इसमें कहीं भी धर्म और जाति के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।

इस बारे में शहजाद राय संस्थान के निदेशक एवं इतिहासकार अमित राय जैन का कहना है कि इंडिया गेट पर क्रांतिकारियों के नाम नहीं लिखे हैं। वहां पर ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए शहीदों के नाम लिखे हुए हैं। इनमें से कुछ ब्रिटिश और ऑस्ट्रेलिया के जवानों के नाम भी शामिल हैं।
देश में अन्य जगहों पर स्मारक
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान शहीद हुए भारत के 1,61,219 सैनिकों और महिलाओं के बलिदान को याद किया जाता है। वे दुनिया भर के लगभग 50 देशों में लड़े और शहीद हुए। देश में प्रथम विश्व युद्ध के भारतीय सैनिकों के कई स्मारक हैं।
– तीन मूर्ति मेमोरियल, दिल्ली
– बंगाली वॉर मेमोरियल, कोलकाता
– लस्कर मेमोरियल, कोलकाता
– पटियाला स्टेट फोर्सेज मेमोरियल
– द बॉम्बे मेमोरियल, मुंबई
– किर्की मेमोरियल, पुणे
– विक्ट्री वार मेमोरियल,चेन्नई
इनके अलावा फ्रांस, जर्मनी, इटली, केन्या, बेल्जियम, माल्टा, रोमानिया, तुर्किए, इंडोनेशिया, इजिप्ट, लेबनान, इजरायल और यूनाइटेड किंगडम में भी प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीयों की याद में मेमोरियल बने हैं।

भारत में इन जगहों पर भी हैं वॉर मेमोरियल
कारगिल: भारत-पाकिस्तान के बीच 1999 के कारगिल युद्ध में कई भारतीय जवान शहीद हुए थे। यह स्मारक उन बहादुरों को एक श्रद्धांजलि है। यह स्मारक कारगिल से 60 किमी दूर द्रास में है। प्रवेश द्वार पर डॉ. हरिवंश राय बच्चन द्वारा उन सैनिकों के लिए लिखी गई एक मार्मिक शोकगीत लिखा हुआ है, जिन्होंने ऑपरेशन विजय के दौरान अपने प्राणों की आहुति दी थी। गुलाबी बलुआ पत्थर की दीवार पर शहीदों के अमर नाम अंकित हैं। हर साल 26 जुलाई को यहां कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।
दार्जिलिंग: इस युद्ध स्मारक का निर्माण दार्जिलिंग और आस-पास के इलाकों के गोरखा सैनिकों के सम्मान और स्मारक के रूप में किया गया था, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद के अभियानों और युद्धों में अपने प्राणों की आहुति दी। इसका उद्घाटन 16 अप्रैल 1995 को हुआ था।
चंडीगढ़: यहां 1947 से लेकर अब तक सेना, वायुसेना और नौसेना के लगभग 8459 शहीद सैनिकों के नाम अंकित हैं। इसका उद्घाटन पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2006 में किया था।
सी वार मेमोरियल, विशाखापटनम: 1996 में स्थापित यह विजय स्मारक भारतीय नौसेना और पूर्वी नौसेना कमान के योद्धाओं की याद मे बनाया गया है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जब पाकिस्तान ने पनडुब्बी पीएनएस गाजी के साथ विशाखापटनम बंदरगाह पर हमला किया और विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को सीधे निशाना बनाया, तो भारतीय नौसेना ने उसे रोकने में सफलता पाई और विजयी हुई थी।
अरुणाचल प्रदेश: तवांग वॉर मेमोरियल 1962 के भारत-चीन युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले बहादुर भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया था। यहां शहीदों के नाम, उनकी रेजिमेंट और उनके बलिदान को सम्मानित करने वाले शिलालेखों से सजाया गया है। यह स्मारक युद्ध के दौरान कामेंग जिले में अपने प्राणों की आहुति देने वाले सशस्त्र बलों के 2,420 जवानों की याद में बनाया गया था।
सियाचिन: इसका निर्माण उन सभी सियाचिन योद्धाओं की याद में किया गया था, जिन्होंने ऑपरेशन मेघदूत के शुरू होने के बाद से सियाचिन क्षेत्र की बर्फीली सीमओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया है। स्मारक की दीवारों पर सभी शहीदों के नाम हैं और उन बटालियनों की सूची भी है, जिन्होंने 1984 से सियाचिन ब्रिगेड में सेवा की है।

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